Tuesday, March 16, 2010
माया मेम साहब के गले से लिपटे हज़ार रूपए के अशंख नोट पर छपे बापू के उतने ही तस्वीर, बापू के रामराज्य का कितना घटिया प्रतिबिब था. दलितों को हरिजन से अलंकृत करने वाले बापू ने क्या कभी ऐसा सोचा होगा की समाज के हासिये से उठकर इनका(दलितों) एक प्रितिनिधि अपने धन बल के बल पर अपनी उन्नति का प्रदर्शन करेगा जबकि वास्तव में बापू के जीवन काल से लेकर आज तक दलितों के स्थिति में मामूली बदलाव ही हुआ है कुछ मायावती जैसे अपवादों को छोड़कर . गावो में रहने वाले दलितों की मासिक आय कुछ १०००-२००० के बीच ही है, यहाँ तक नरेगा में भले ही रिकॉर्ड में इनके नाम आते है लेकिन कमाता कोई और है, दलितों के नाम पर आई अब तक राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओ ने न जाने कितने अधिकारी और नेता टाइप लोगो का बिकास झटके में कर डाला लेकिन गाँव का दलित अब भी केवल रैलीओं में बैठकर इस उम्मीद के साथ ताली बजाता हुए राजनितिक ड्रामा देखता है की शायद इस बार छालवा नहीं है.
Sunday, March 7, 2010
अभी हाल में ही संसद में पेड न्यूज़ पर चर्चा हुई सांसदों के साथ मीडिया ने भी इसपर रोक लगाने की मांग की. व्वासिकता के इस दौर में यह सार्थक होगा इसकी उम्मीद काफी कम है. इलेक्ट्रोनिक मीडिया तो इस बात के लिए पहले ही बदनाम रहा है दूरदर्शन और आकाशवाणी सरकार और सत्ता पार्टी द्वारा निर्देशित होते है और निजी चैनल खास लोगो द्वारा.उदहारण के लिए अभी हाल में ही सारे चैनल MY NAME IS KHAN की रिपोर्टिंग लन्दन और पेरिस से कर रहे थे ऐसा लग रहा था की बॉलीवुड की यह फिल्म होल्लीवूड की बाट लगा देगी , जो चैनल वर्ल्ड कप, ओलंपिक, कोई अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन जैसे महत्पूर्ण आयेजनो में भी अपने प्रतिनिधि नहीं भेज पाते उनके लोग पेरिस और लन्दन एक फिल्म को कवर करने चले गए यह सवाल तो उठना जायज है हलाकि फिल्म सफल रही इसमें दो राय नहीं की फिल्म अच्छी थी यहा फिल्म की नहीं मै मीडिया को रोल की चर्चा कर रहा हु . लोकसभा में महगाई में चर्चा के दौरान शरद यादव ने मीडिया के बदलते स्वरुप की चर्चा की थी जो सायद मीडिया को नागवार गुजरी और सुर्खियो से गायब हो गई. एक जमाना था जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता था क्या आज भी यह उसी मजबूती के साथ खड़ा है ? यह बहुत बड़ा सवाल है. मीडिया के दिग्गजों ने अपनी कलम की ताकत के बल पर कई जनहित के सवालो को जनांदोलन के द्वारा सही दिशा देते थे. लेकिन आज कलम के जगह कैमरे ने ले ली जो मुद्दा कमरे में आता है मीडिया के लिए उसी की अहमियत है स्टिंग ऑपरेशन तो आम बात है मीडिया को सीना चौडा करने के लिए कभी किसी बाबा का , कभी राजनेता का , कभी किसी सेलिब्रिटी का लेकिन अधिकांश वक्तिगत ही होते है हा उनका बस इतना सामजिक असर होता है की उस हस्ती का घर और कार्यालय में तोड़ फोड़ हो जाती है .हा किसी ने गलती से किसी खास मुद्दे की पड़ताल कर दी तो उसे एक या दो बार दिखा कर और प्रेस वाले एक दिन छाप कर अगले दिन भूल जाते है .अभी हाल में ही रेल बजट के दिन सचिन ने एकदिवसीय क्रिकेट में दोहरा शतक लगा दिया उसी समय सारे मीडिया रेल को बुल कर क्रिकेट की सवारी करने लगे. सचिन का शतक हमारे लिए गौरव की बात थी लेकिन रेल बजट तो पहला हेड लाइन बनता था लेकिन रेल बजट का बिश्लेषण आसन नहीं होता जितना क्रिकेट का है ओ भी सचिन का २० साल के उसके खेल की क्लिपिंग है रिपोर्ट जितना चाहो उतना लम्बा बन जायगा कलम जितना घिसना चाहो घिस जायेगा. क्यू की बिज्ञापन दाताओं के हित के बारे में पहले सोचना है जिनकी नज़र में क्रिकेट ज्यादा महत्वपूर्ण है. आजादी एक आस पास भारत के ग्रामीण इलाको में पेपर दो तिन दिन बाद पहुचता था थोडा समय बदला और रेडियो भी आ गया जिसमे खबर खास समय पर आता था जिसे पूरा मोहल्ला मिल कर सुनता था और फिर टीवी आया और फिर २४ घंटे के न्यूज़ चैनल और समाचार पत्र भी अबतक चैनल से अलग जगह बना चुके थे इंडिया टुडे टाइप के कई समाचार पत्रिकाए भी काफी लोकप्रिय हो गई थी और सभी अपने रोल भी बखूबी निभा रहे थे तभी समय बदला और मीडिया में नैतिकता से ज्यादा व्यसिकता हावी होने लगा. ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुच के लिए लोकल संस्करण और चैनल शुरू होने लगे यही से मीडिया के रोल पर उंगली उठने लगी जो वाजिब है जैसे की मीडिया में महगाई को तब जगह मिलती है जब समय ज्यादा हो या प्रिंट करने के लिए जगह बच जाये क्यू की आज रिपोर्टिंग महानगरो या शहरी क्षेत्रो को धयान में रखकर की जाती है जहाँ लोगो की आर्थिक स्थिति गावो के तुलना में ज्याद अच्छा है और गावो को लोकल चैनल या स्थानीय संस्करण के लिए छोड़ दिया गया है. लेकिन पहले एक एडिशन होने के कारण प्रकाश में किसी घटना को आना काफी गंभीर माना जाता था.जो अब गंभीरता गायब है आज पहले पन्ने पर बिज्ञापन छपता है और चैनल पर बिज्ञापन सही समय पर शुरू हो जाता है चाहे रिपोर्ट अधुरा ही क्यू नहीं रह जाये. संसद में हुए कार्यवाही पर रिपोर्ट १४ या १५ वे पेज पर छपती है लेकिन फिल्मफेयर का समाचार और तस्बीर पहले पन्ने पर न्यूज़ चैनल भी संसद को दोनों सदनों के बहस के निचोड़ का एक पाच मिनट का रिपोर्ट नहीं बना सकते लेकिन अमरेन्द्र सिंह के किताब बिमोचन में उनकी बीबी न जा कर संदन में चली गई थी यह ब्रेअकिंग न्यूज़ बन जाता है.
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