Tuesday, March 16, 2010

माया मेम साहब के गले से लिपटे हज़ार रूपए के अशंख नोट पर छपे बापू के उतने ही तस्वीर, बापू के रामराज्य का कितना घटिया प्रतिबिब था. दलितों को हरिजन से अलंकृत करने वाले बापू ने क्या कभी ऐसा सोचा होगा की समाज के हासिये से उठकर इनका(दलितों) एक प्रितिनिधि अपने धन बल के बल पर अपनी उन्नति का प्रदर्शन करेगा जबकि वास्तव में बापू के जीवन काल से लेकर आज तक दलितों के स्थिति में मामूली बदलाव ही हुआ है कुछ मायावती जैसे अपवादों को छोड़कर . गावो में रहने वाले दलितों की मासिक आय कुछ १०००-२००० के बीच ही है, यहाँ तक नरेगा में भले ही रिकॉर्ड में इनके नाम आते है लेकिन कमाता कोई और है, दलितों के नाम पर आई अब तक राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओ ने न जाने कितने अधिकारी और नेता टाइप लोगो का बिकास झटके में कर डाला लेकिन गाँव का दलित अब भी केवल रैलीओं में बैठकर इस उम्मीद के साथ ताली बजाता हुए राजनितिक ड्रामा देखता है की शायद इस बार छालवा नहीं है.

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