Monday, November 21, 2011

ham bahrat ke log hame chota rajya chahiye

"मिले सुर मेरा तुम्हारा "सबको अलग राज्य चाहिए. जो राजनेता अपनी गाड़ी नहीं चला सकते उनको भी राज्य चाहिए चलाने के लिए . मैं इन राजनेताओ से यह पूछना चाहता हु क्या छोटे छोटे राज्य प्रगति के सूत्र है ? इन ६२ सालो में देश का अनुभव तो बिलकुल अच्छा नहीं नहीं रहा है . यहाँ तक की इतिहास में भी देखे तो हमसे अलग हुए संप्रभु राज्य अफगानिस्तान , पाकिस्तान , म्यन्मार, श्रीलंका, और बंगलादेश का क्या हाल है? मैं इनकी चर्चा यहाँ नहीं करना चाहता की किन परिस्थितियों में जुड़े या अलग हुए. बर्तमान में हमारे पास २८ राज्य और ७ केंद्र शासित प्रदेश है. दो राज्य जम्मू और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के बारे में पाकिस्तान और चीन की क्या राय है यह आज किसी से छुपी नहीं है. अगर थोडा इतिहास पर नज़र डाले तो १९५६ से हमारी मानचित्र बदलने लगा १ मई १९६० को महाराष्ट्र और गुजरात , १ दिसम्बर १९६३ को नागालैंड, १ नवम्बर १९६६ को पंजाब(१९४७ से ), हरियाणा और केंद्रशासित चंडीगड़ , २१ जनवरी १९७२ को मणिपुर,मेघालय और त्रिपुरा , २६ अप्रैल १९७५ को सिक्किम(बिलय), २० फ़रवरी १९८७ को अरुणांचल और मिजोरम : ३० मई १९८७ को गोवा राज्य दमन और दिव केंद्र शासित प्रदेश :१ नवम्बर २००० को छत्तीसगढ़ : ९ नवम्बर २००० को उतरांचल : १५ नवम्बर २००० को झारखण्ड अगर बर्तमान परिद्रिस्य में देखे तो गुजरात और हरियाणा ही आर्थिक रूप से संपन्न नज़र आते है. जबकि उलट २००० में बिभाजित हुआ प्रदेश बिहार और मध्यप्रदेश जहा कानून और बेवस्था में औसत नजर आते है वही नए राज्य छत्तीसगढ़ और झारखण्ड नक्सलवाद से जूझते हुए . अगर हम सारे मांगो को मान कर राज्य बना दे तो निकट भबिष्य में हमारे पास तेलंगाना, गोरखालैंड, बोडोलैंड, हरित प्रदेश , बुंदेलखंड, बिदर्भ,प्रदेश होंगे और कुछ समय बाद कोडागु, तुलुनाडू,पूर्वांचल,भोजपुर, कोसल, अंगिका, मिथलांचल, गोंडवाना,कामतापुर, कर्बिआन्लोन्ग, रायलसीमा, विद्या प्रदेश , सौराष्ट्र,....... शायद भारत के हर कमिश्नरी को एक राज्य बनाना पड़े .आखिर क्या सोचकर संबिधान निर्माताओ ने राज्यों के संख्या सिमित की जबकि १९४७ में हमारे पास सैकड़ो छोटे छोटे प्रदेश थे.मेरा मानना है प्रगति साथ रहने से होती है अलग अलग रहने से नहीं. हा बिभाजन के बाद क्षणिक लाभ राजनितिक दलों को हो जाता है और सत्ता में भी आ जते है लेकिन दूरगामी ये की छोटे राज्यों में अगर किसी एक दल का एकछत्र राज ना हो तो सत्ता का बदल और चुनाव के बादल हमेशा मदराते रहते है.

THURSDAY, DECEMBER 10, 2009

i am the best

हमारे देश में आदमी शायद जन्म से ही अनुभवी होता है उन्हें किसी प्रकार खास शिक्षा और TRAINNING की आवश्यकता ही नहीं होती. देश के जो भाग्य विधाता है "नेता" जब वो सबिधानिक पद पर नियुक्त होते है तो बिना किसी TRANNING के कुशलतापूर्वक कार्यनिर्वाह करने लगते है और बिलकुल बिपरीत परिस्थिति हमारे किसानो के साथ है वह मज़बूरी में परम्परिक अनुभवो के साथ कुशलतापूर्वक खेती करते आ रहा है. यहा आश्चर्यजनक बात ये है की आज़ादी के ६२ साल बाद भी हमने देश के इन दोनों अधारो के लिए कोई निति क्यू नहीं बनाई . मुझे इन दोनों के प्रतिभा पर कोई शक नहीं है क्यू की इन ६२ सालो में हमने जो बिकास किया है वह इनके ही मेहनत का परिणाम है. लेकिन अगर इन्होने TRANNING पाया होता तो शायद स्थिति आज ज्यादा बेहतर होती. इस वैज्ञानिक युग में कृषि का स्वरूप बिलकुल बदल चूका है लेकिन हामारे किसान आज भी सदियों से चल रहे पारंपरिक तरीको से ही खेती कर रहे है और परिणाम की सूखे और बाढ़ से निपटने में बिलकुल अक्षम है और अपनी सारी पूंजी भी खेतो में झोक देते है. और हास्यास्पद बाद ये है की हमारे यहाँ प्राथमिक विद्यालयों में पढाया जाता है की मौसमी खेती एक जुआ है कैसे? हम देश में उच्य शिक्षा संस्था खोलने के लिए ज्यादा हल्ला मचाते है वह भी जरुरी है मैं उसका बिरोध नहीं कर रहा लेकिन किसानो के लिए सोचते ही नहीं. हमारे देश का एक आम किसान नहीं जनता SUBSIDY का मतलब. बिजली, पानी और सड़क तो उसके लिए हर रोज की समस्या है जिसका वह आदि हो चूका है. अगर उसे पानी चाहिए तो खुद गड्ढा खोदता है लापरवाही में उसके ही बच्चे उसमे गिरते है .गाँव में रहने वाले किसानो ने सड़क की समस्या उसके आन्तरिक दिमाग में इस कदर धर गया था की थोड़ी सा मौका मिला और वह HOLICOPTER से शादी करने लगे. बिजली के अभाव में GENRETOR और PUMPING सेट्स डीज़ल से चले वाला उन्होंने खरीद रखा है क्यू की जब खेत अपना है तो खेती के लिए भी खुद ही जुगाड़ करना होगा क्यू की सरकार जो सदम में बोलती है वह उनके समझ में नहीं आती है ha हर पाचवे साल उन्हें कोई समझाने का असफल प्रयास कर जीता है . अब बात नेता जी की हमारे हर रहनुमा तथाकथित किसान, गरीब या जमींन से जुड़ा होता है जो उसके गाड़ी और कपडे से तो नहीं लगता के समझ में यह क्यू नहीं आता की जाती और धर्म की राजनीती से महगाई नहीं नियंत्रित होती

Tuesday, March 16, 2010

माया मेम साहब के गले से लिपटे हज़ार रूपए के अशंख नोट पर छपे बापू के उतने ही तस्वीर, बापू के रामराज्य का कितना घटिया प्रतिबिब था. दलितों को हरिजन से अलंकृत करने वाले बापू ने क्या कभी ऐसा सोचा होगा की समाज के हासिये से उठकर इनका(दलितों) एक प्रितिनिधि अपने धन बल के बल पर अपनी उन्नति का प्रदर्शन करेगा जबकि वास्तव में बापू के जीवन काल से लेकर आज तक दलितों के स्थिति में मामूली बदलाव ही हुआ है कुछ मायावती जैसे अपवादों को छोड़कर . गावो में रहने वाले दलितों की मासिक आय कुछ १०००-२००० के बीच ही है, यहाँ तक नरेगा में भले ही रिकॉर्ड में इनके नाम आते है लेकिन कमाता कोई और है, दलितों के नाम पर आई अब तक राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओ ने न जाने कितने अधिकारी और नेता टाइप लोगो का बिकास झटके में कर डाला लेकिन गाँव का दलित अब भी केवल रैलीओं में बैठकर इस उम्मीद के साथ ताली बजाता हुए राजनितिक ड्रामा देखता है की शायद इस बार छालवा नहीं है.

Sunday, March 7, 2010

अभी हाल में ही संसद में पेड न्यूज़ पर चर्चा हुई सांसदों के साथ मीडिया ने भी इसपर रोक लगाने की मांग की. व्वासिकता के इस दौर में यह सार्थक होगा इसकी उम्मीद काफी कम है. इलेक्ट्रोनिक मीडिया तो इस बात के लिए पहले ही बदनाम रहा है दूरदर्शन और आकाशवाणी सरकार और सत्ता पार्टी द्वारा निर्देशित होते है और निजी चैनल खास लोगो द्वारा.उदहारण के लिए अभी हाल में ही सारे चैनल MY NAME IS KHAN की रिपोर्टिंग लन्दन और पेरिस से कर रहे थे ऐसा लग रहा था की बॉलीवुड की यह फिल्म होल्लीवूड की बाट लगा देगी , जो चैनल वर्ल्ड कप, ओलंपिक, कोई अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन जैसे महत्पूर्ण आयेजनो में भी अपने प्रतिनिधि नहीं भेज पाते उनके लोग पेरिस और लन्दन एक फिल्म को कवर करने चले गए यह सवाल तो उठना जायज है हलाकि फिल्म सफल रही इसमें दो राय नहीं की फिल्म अच्छी थी यहा फिल्म की नहीं मै मीडिया को रोल की चर्चा कर रहा हु . लोकसभा में महगाई में चर्चा के दौरान शरद यादव ने मीडिया के बदलते स्वरुप की चर्चा की थी जो सायद मीडिया को नागवार गुजरी और सुर्खियो से गायब हो गई. एक जमाना था जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता था क्या आज भी यह उसी मजबूती के साथ खड़ा है ? यह बहुत बड़ा सवाल है. मीडिया के दिग्गजों ने अपनी कलम की ताकत के बल पर कई जनहित के सवालो को जनांदोलन के द्वारा सही दिशा देते थे. लेकिन आज कलम के जगह कैमरे ने ले ली जो मुद्दा कमरे में आता है मीडिया के लिए उसी की अहमियत है स्टिंग ऑपरेशन तो आम बात है मीडिया को सीना चौडा करने के लिए कभी किसी बाबा का , कभी राजनेता का , कभी किसी सेलिब्रिटी का लेकिन अधिकांश वक्तिगत ही होते है हा उनका बस इतना सामजिक असर होता है की उस हस्ती का घर और कार्यालय में तोड़ फोड़ हो जाती है .हा किसी ने गलती से किसी खास मुद्दे की पड़ताल कर दी तो उसे एक या दो बार दिखा कर और प्रेस वाले एक दिन छाप कर अगले दिन भूल जाते है .अभी हाल में ही रेल बजट के दिन सचिन ने एकदिवसीय क्रिकेट में दोहरा शतक लगा दिया उसी समय सारे मीडिया रेल को बुल कर क्रिकेट की सवारी करने लगे. सचिन का शतक हमारे लिए गौरव की बात थी लेकिन रेल बजट तो पहला हेड लाइन बनता था लेकिन रेल बजट का बिश्लेषण आसन नहीं होता जितना क्रिकेट का है ओ भी सचिन का २० साल के उसके खेल की क्लिपिंग है रिपोर्ट जितना चाहो उतना लम्बा बन जायगा कलम जितना घिसना चाहो घिस जायेगा. क्यू की बिज्ञापन दाताओं के हित के बारे में पहले सोचना है जिनकी नज़र में क्रिकेट ज्यादा महत्वपूर्ण है. आजादी एक आस पास भारत के ग्रामीण इलाको में पेपर दो तिन दिन बाद पहुचता था थोडा समय बदला और रेडियो भी आ गया जिसमे खबर खास समय पर आता था जिसे पूरा मोहल्ला मिल कर सुनता था और फिर टीवी आया और फिर २४ घंटे के न्यूज़ चैनल और समाचार पत्र भी अबतक चैनल से अलग जगह बना चुके थे इंडिया टुडे टाइप के कई समाचार पत्रिकाए भी काफी लोकप्रिय हो गई थी और सभी अपने रोल भी बखूबी निभा रहे थे तभी समय बदला और मीडिया में नैतिकता से ज्यादा व्यसिकता हावी होने लगा. ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुच के लिए लोकल संस्करण और चैनल शुरू होने लगे यही से मीडिया के रोल पर उंगली उठने लगी जो वाजिब है जैसे की मीडिया में महगाई को तब जगह मिलती है जब समय ज्यादा हो या प्रिंट करने के लिए जगह बच जाये क्यू की आज रिपोर्टिंग महानगरो या शहरी क्षेत्रो को धयान में रखकर की जाती है जहाँ लोगो की आर्थिक स्थिति गावो के तुलना में ज्याद अच्छा है और गावो को लोकल चैनल या स्थानीय संस्करण के लिए छोड़ दिया गया है. लेकिन पहले एक एडिशन होने के कारण प्रकाश में किसी घटना को आना काफी गंभीर माना जाता था.जो अब गंभीरता गायब है आज पहले पन्ने पर बिज्ञापन छपता है और चैनल पर बिज्ञापन सही समय पर शुरू हो जाता है चाहे रिपोर्ट अधुरा ही क्यू नहीं रह जाये. संसद में हुए कार्यवाही पर रिपोर्ट १४ या १५ वे पेज पर छपती है लेकिन फिल्मफेयर का समाचार और तस्बीर पहले पन्ने पर न्यूज़ चैनल भी संसद को दोनों सदनों के बहस के निचोड़ का एक पाच मिनट का रिपोर्ट नहीं बना सकते लेकिन अमरेन्द्र सिंह के किताब बिमोचन में उनकी बीबी न जा कर संदन में चली गई थी यह ब्रेअकिंग न्यूज़ बन जाता है.

Wednesday, February 3, 2010

मुम्बई मुद्दा राजनीती का व्यावासिकरण है यहाँ सबको अपनी अपनी दुकान चलानी है . चाहे राजनितिक दल हो, बॉलीवुड हो या मीडिया.एक अंग्रेजी समाचारपत्र से कैरिएर के शुरुआत करने वाले बाल ठाकरे द्वारा माइकल जैक्सन का मुंबई आने पर स्वागत किया जाता है जावेद मियादाद के साथ फोटो खिचवाते है तीनो ठाकरे, बिहारी संजय निरुपम को अपनी पेपर का उपसंपादक बनाते है, बिहार उत्तर प्रदेश के अधिकता वाले सांसदों के साथ मिलकर करीब ६ साल केंद्र में राज करते है , उनका परिवार दो हिंदी फिल्मो का निर्माण करता है और दोनों सफल भी होती है तब न तो उन्हें मराठी मानुष याद आता है न मराठी लेकिन वोट बैंक खिसकता देखकर बाल ठाकरे जीवन के अंतिम पड़ाव पर मराठी मानुष के नाम पर अपने भतीजे के साथ राजनितिक प्रायश्चित कर रहे है एक्सन और थ्रिलर के साथ .
बॉलीवुड भी फक्र के साथ उनसे माफ़ी मांगता है(माय नाम इस खान के निर्देशक कारन जोहर WAKE UP SID के लिए) IPL में पाकिस्तानी खिलाडी तो नहीं खरीदते किंग खान लेकिन चिंगारी लगाने में पीछे नहीं रहते यह मजाक नहीं है तो और क्या है IPL का बजट SOUTH AFRIKA में कराने का है लेकिन पाकिस्तानी क्रिक्केटर खरीदने से बजट बिगड़ जाता है खुलकर कोई नहीं कहता की हमने पाकिस्तानी क्रिकेटरो को कुछ चरमपंथी ताकतों के डर से नहीं ख़रीदा (शिल्पा शेट्टी को छोड़कर). बादशाह बच्चन अपने फिल्म रण को लेकर बाल ठाकरे के घर पहुचने वाले है फिल्म में कांग्रेस के बड़े नेता बिलासराव देशमुख के पुत्र भी है यहाँ किसको राहुल गाँधी बता रहे है की ठाकरे की बात वह सुनते ही नहीं . शायद फिर किंग खान और कारन जोहर क्षमा याचना के लिए ठाकरे बंधू के घर जाये .
मुझे नहीं पता की सामना का सर्कुलेसन कितना है लेकिन रोज सुबह में TV खोलने पर उसमे छापी बेबुनियाद खबर का जिक्रे जरूर होता है क्यू की सस्ता और टिकाऊ रास्ता है न्यूज़ जुटाने का .
मतलब साफ है हर कोई बहती गंगा में हाथ दो रहा है गंगा कितनी दुसित हो रही है इससे किसी को मतलब नहीं है . यहाँ ना तो बिहार से किसी को मतलब है न महारास्त्र से सबको यहाँ अपने पाकेट और पोस्ट की चिंता है.

Thursday, December 10, 2009

i am the best

हमारे देश में आदमी शायद जन्म से ही अनुभवी होता है उन्हें किसी प्रकार खास शिक्षा और TRAINNING की आवश्यकता ही नहीं होती. देश के जो भाग्य विधाता है "नेता" जब वो सबिधानिक पद पर नियुक्त होते है तो बिना किसी TRANNING के कुशलतापूर्वक कार्यनिर्वाह करने लगते है और बिलकुल बिपरीत परिस्थिति हमारे किसानो के साथ है वह मज़बूरी में परम्परिक अनुभवो के साथ कुशलतापूर्वक खेती करते आ रहा है. यहा आश्चर्यजनक बात ये है की आज़ादी के ६२ साल बाद भी हमने देश के इन दोनों अधारो के लिए कोई निति क्यू नहीं बनाई . मुझे इन दोनों के प्रतिभा पर कोई शक नहीं है क्यू की इन ६२ सालो में हमने जो बिकास किया है वह इनके ही मेहनत का परिणाम है. लेकिन अगर इन्होने TRANNING पाया होता तो शायद स्थिति आज ज्यादा बेहतर होती. इस वैज्ञानिक युग में कृषि का स्वरूप बिलकुल बदल चूका है लेकिन हामारे किसान आज भी सदियों से चल रहे पारंपरिक तरीको से ही खेती कर रहे है और परिणाम की सूखे और बाढ़ से निपटने में बिलकुल अक्षम है और अपनी सारी पूंजी भी खेतो में झोक देते है. और हास्यास्पद बाद ये है की हमारे यहाँ प्राथमिक विद्यालयों में पढाया जाता है की मौसमी खेती एक जुआ है कैसे? हम देश में उच्य शिक्षा संस्था खोलने के लिए ज्यादा हल्ला मचाते है वह भी जरुरी है मैं उसका बिरोध नहीं कर रहा लेकिन किसानो के लिए सोचते ही नहीं. हमारे देश का एक आम किसान नहीं जनता SUBSIDY का मतलब. बिजली, पानी और सड़क तो उसके लिए हर रोज की समस्या है जिसका वह आदि हो चूका है. अगर उसे पानी चाहिए तो खुद गड्ढा खोदता है लापरवाही में उसके ही बच्चे उसमे गिरते है .गाँव में रहने वाले किसानो ने सड़क की समस्या उसके आन्तरिक दिमाग में इस कदर धर गया था की थोड़ी सा मौका मिला और वह HOLICOPTER से शादी करने लगे. बिजली के अभाव में GENRETOR और PUMPING सेट्स डीज़ल से चले वाला उन्होंने खरीद रखा है क्यू की जब खेत अपना है तो खेती के लिए भी खुद ही जुगाड़ करना होगा क्यू की सरकार जो सदम में बोलती है वह उनके समझ में नहीं आती है ha हर पाचवे साल उन्हें कोई समझाने का असफल प्रयास कर जीता है . अब बात नेता जी की हमारे हर रहनुमा तथाकथित किसान, गरीब या जमींन से जुड़ा होता है जो उसके गाड़ी और कपडे से तो नहीं लगता के समझ में यह क्यू नहीं आता की जाती और धर्म की राजनीती से महगाई नहीं नियंत्रित होती